पाचन शक्ति को बनायें बेहतर
खानपान में गड़बड़ी, अनिश्चित दिनचर्या तथा भागदौड़ भरी जिंदगी के कारण अधिकतर लोग पाचन संस्थान की बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं। किन्तु सही पाचन शक्ति हमारे शरीर का मूल है। अतः पाचन क्रिया को सही रखना बहुत जरुरी है । एसीडिटी, कब्ज, गैस, अजीर्ण, अनिद्रा, अरुचि, बवासीर एवं भगंदर आदि मुख्य समस्यायें हैं ।
पाचन क्रिया सही रखने के उपाय-
1. खाना निगलें नहीं अच्छी तरह चबाकर खायें- भोजन आराम से बैठकर शांतिपूर्वक करना चाहियें । प्रत्येक कौर को अच्छी तरह चबाकर खाने से लार रस उसमे अच्छी तरह मिल जाता है जिससे गैस, अपचन, एसीडिटी, कब्ज से बचाव होता है |
2. फाइबर जरूर लें- फाइबर या रेशा हरी सब्जियों, फल फ्रूट, चोकर युक्त आटा में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है । इसमें बवासीर, भगंदर, कब्ज, गैस से बचाव होता है ।
3. सन्तुलिर भोजन लें- पूड़ी पराँठे, मिर्च मसाले, जंक फ़ूड का सेवन न करें, बल्कि दूध,दही,छाछ, दलिया, खिचड़ी, अंकुरित अन्त, सलाद आदि को अपने खानपान में शामिल करें ।
4. सुबह शाम घूमें- शाम को खाना खाने के बाद घूमना मोटापा, कॉलेस्ट्रोल, उच्च क्तचाप, एसीडिटी जैसे अनेक रोगों से बचाता हैं, पाचन क्रिया सही रहती है । खाना सही से हजम होता है । अच्छी नींद आती है । इसी तरह सुबह ताजी हवा में घूमना, मन को प्रफुल्लित कर देता है, रोगों से बचाता है | शरीर में चुस्ती फुर्ती रहती है । योग, व्यायाम, प्राणायाम का नित्य अभ्यास करें ।
5. घरेलु उपाय- (A) आधी चम्मच अजवायन के साथ थोड़ा सा काला नमक एवं थोड़े से सोंठ पाउडर की फाँकी लेकर ऊपर से गरम पानी पीने से अफारा, गैस, पेट दर्द में आराम आता है |
(B) कब्ज होने पर 2-3 छोटी हरड़ को तवे पर फुलाकर चूर्ण गरम पानी से रात में लेना कब्ज, बवासीर, गैस में लाभदायक है |
(C) खाने में रूचि ना हो तो एक निम्बू के दो टुकड़े करके उन पर 2-3 काली मिर्च एवं थोडा सा काला नमक का पाउडर डालकर तवे पर निम्बू गरम करके चूसना भूख बढ़ाता है, पाचन सही करता है। बुखार व जुकाम के बाद होने वाली अरुचि को दूर करता है ।
6. आयुर्वेद- हींग, लहसुन, आंवला, हरड़, काला व सैंधा नमक, काली मिर्च, पिप्पली चित्रक, निशोथ, जीरा सोंफ आदि जड़ी बूटियां पेट के रोगों में बहुत उपयोगी हैं । इन्हें चिकित्सक की राय से सेवन करें ।
Monday, 29 February 2016
पाचन क्रिया सही रखने के उपाय
Friday, 26 February 2016
गांधी जी से सीखें टाइम मैनेजमेंट MUST READ
गांधी जी से सीखें टाइम मैनेजमेंट
🎯🎯🎯🎯🎯🎯🎯
महात्मा गांधी विश्व की महानतम हस्तियों में से एक हैं । उनकी आत्मकथा ” सत्य के प्रयोग ” विश्व की सबसे अधिक
पढ़े जाने वाली आत्मकथाओं में है। गांधी जी का प्रेरणादायी जीवन हमें बहुत कुछ सीखाता है और उन्ही में से एक महत्त्वपूर्ण बात जो हम सीख सकते हैं वो है समय प्रबंधन या टाइम मैनेजमेंट।
गांधी जी समय के बहुत पाबन्द थे। वे हमेशा अपने पास एक डॉलर वाच रखते थे। अपने जीवनी में उन्होंने समय सारिणी के अनुसार काम करने की बाते बताई है। समय ही जीवन है । यहाँ बतायी गयीं बातें हम सभी के लिए प्रेरणादायी है। हम समय का सदुपयोग उनके प्रेरणादायी जीवन से सीख सकते है।
गांधीजी का ‘TIME MANAGEMENT’
1] गांधीजी ने कभी किसी से नहीं कहा कि ‘मैं बहुत व्यस्त हूँ और अमुक काम के लिए समय नहीं निकाल सकता।
2] गांधीजी के पास छोटे बच्चों से लेकर समाज के अग्रणी लोगों के पत्र आते थे ,और वे बिना किसी विलम्ब के हर पत्र का उत्तर देते थे।
3] आश्रम के रसोईघर में प्रतिदिन सुबह का नाश्ता करने के पश्चात् वे सब्जी काटने का काम अचूक करते थे।
4] कोई छोटा या बड़ा व्यक्ति जो आश्रम में रहता हो, और यदि वो बीमार पड़ जाए तो गांधीजी खुद उससे मिलते और उसके उपचार की व्यवस्था किए बिना नहीं रहते।
5] कुछ मित्रों ने उन्हें फरियाद करते कहा कि ‘आपने अभी तक साम्यवादी साहित्य पढ़ा नहीं,’ जेल में भोजन के समय या नाश्ता करते करते उन्होंने ‘Humanity uprooted’ और ‘Red bread’ इत्यादि पुस्तके पढ़ डालीं।
6] बंगाल के गाँवो में काम करते समय स्थानीय लोगों से आत्मीयता हो सके इसलिए उन्होंने बंगाली सीखना शुरू किया जबकि वे तब तक काफी वृद्ध हो चुके थे।
7] हस्पताल में बीमार पड़े व्यक्ति के पास बैठ कर पुस्तक पढ़ना या उसके पत्रों को लिखने का काम वे वकील बनने के बाद भी करते रहे।
8] प्रतिदिन रेटियो पे १२० सूत के तार बनाना, सुबह ४ बजे प्रार्थना करना, और सुबह- शाम ४५ मिनट के लिए टहलने जाने का काम भी वे अचूक करते थे।
🎯(9] गांधीजी ने दातून करते-करते ‘गीता’ के 13 अध्याय कंठस्थ किए थे ।
10] स्वामी आनंद के कहने पर वे प्रतिदिन गीता के १ श्लोक का अनुवाद करते। इसी के कारण हमें ‘अनासक्ति’ पुस्तक मिली।
11] ‘महाभारत’ पढ़े बिना ‘हिन्दू-धर्म’ का मर्म-रहस्य समझना मुश्किल है, ऐसा जानके सने १९२२ में येरवडा जेल में उन्हों ने महाभारत के १८ पर्व पढ़ डाले।
12] गांधीजी कहते थे कि “भारत देश की गौरवशाली और अनुकम्पा भरी जीवन दृष्टि स्वामी विवेकानंदजी का साहित्य पढ़ के मुझमे विकसित हुई है। ” सार्वजानिक जीवन में इतना सक्रीय होते हुए भी उन्होंने स्वामी जी का सम्पूर्ण साहित्य अक्षरश: पढ़ा हुआ था।🎯🎯🎯🎯🎯
Wednesday, 24 February 2016
STORY- सफलता का रहस्य
सफलता का रहस्य
एक बार एक नौजवान लड़के ने सुकरात से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या है?
सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल मुझे नदी के किनारे मिलो.वो मिले. फिर सुकरात ने नौजवान से उनके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा.और जब आगे बढ़ते-बढ़ते पानी गले तक पहुँच गया, तभी अचानक सुकरात ने उस लड़के का सर पकड़ के पानी में डुबो दिया. लड़का बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा , लेकिन सुकरात ताकतवर थे और उसे तब तक डुबोये रखे जब तक की वो नीला नहीं पड़ने लगा. फिर सुकरात ने उसका सर पानी से बाहर निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो चीज उस लड़के ने सबसे पहले की वो थी हाँफते-हाँफते तेजी से सांस लेना.
सुकरात ने पूछा ,” जब तुम वहाँ थे तो तुम सबसे ज्यादा क्या चाहते थे?”
लड़के ने उत्तर दिया,”सांस लेना”
सुकरात ने कहा,” यही सफलता का रहस्य है. जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना की तुम सांस लेना चाहते थे तो वो तुम्हे मिल जाएगी” इसके आलावा और कोई रहस्य नहीं है
STORY- गधे का रास्ता –
गधे का रास्ता –
एक छोटे से गाँव में भोलू नाम का एक गधा रहता था। वह गाँव बाकी दुनिया से बिलकुल कटा हुआ था, न वहां कोई आता था और न वहां से कोई कहीं जाता था।
एक बार गधे ने सोचा क्यों ना जंगल के उस पार जाकर देखा जाए कि आखिर उस तरफ है क्या?
अगले दिन भोर में ही वह जंगल की ओर बढ़ चला।
जंगल घना था और गधा मूर्ख। बिना सोचे समझे उसे जिधर मन करता उधर चल पड़ता। जैसे-तैसे करके उसने जंगल पार किया और दूसरी छोर पर स्थित एक और गाँव पहुँच गया।
उधर गाँव में हल्ला मच गया कि भोलू गधा गाँव छोड़ कर चला गया है, सब बात करने लगे कि वो कितना भाग्यशाली है, और अब कितनी आराम की ज़िन्दगी जी रहा होगा। लोगों की बात सुनकर कुत्तों के एक झुण्ड ने भी जंगल पार करने का निश्चय किया।
अगली सुबह वह गधे की गंध का पीछा करते हुए उसी रास्ते से जंगल के उस पार चले गए।
फिर क्या था, गाँव के अन्य पशुओं में भी जंगल पार करने की होड़ सी लग गयी और सभी गधे द्वारा खोजे गए रास्ते पर चलते हुए जंगल पार करने लगे।
बार-बार उस रास्ते पर चलने से एक पगडण्डी सी बन गयी और कुछ सालों बाद इंसान भी उसी रास्ते को पकड़ कर जंगल पार करने लगे । समय बीतता गया और धीरे-धीरे गाँव की आबादी काफी बढ़ गयी। तब सरकार ने जंगल पार करने के लिए एक रोड बनाने का निर्णय लिया गया।
शहर से इंजीनियरों का एक दल आया और इलाके की स्टडी करने लगा।
गाँव वालों ने बताया कि जंगल पार करने के लिए एक पगडण्डी बनी हुई है उसी पर अगर रोड बना दी जाए तो अच्छा रहेगा।
उनकी बात सुनकर चीफ इंजीनियर थोडा मुस्कुराया और बोला, “ क्या मैं जान सकता हूँ ये पगडण्डी किसने बनायी ?”
गाँव के एक बुजुर्ग बोले, “जहाँ तक मुझे पता है ये रास्ता किसी गधे ने खोजा था !”, और उसने पूरी कहानी कह सुनाई ।
उनकी बात सुनने के बाद चीफ इंजीनियर बोले, “मुझे यकीन नहीं होता कि आप सब इंसान होंते हुए भी इतने सालों से एक गधे के बनाये रास्ते पर चल रहे थे…पता है ये रास्ता कितना कठिन और लम्बा है जबकि हमने जो रास्ता खोजा है वो इसका एक चौथाई भी नहीं है और उसे पार करना भी कहीं आसान है। ”
आज गाँव वालों को अपनी गलती का एहसास हो रहा था, वे सोच रहे थे कि काश उन्होंने एक नया रास्ता खोजने का प्रयास किया होता!
दोस्तों, जो गलती उन गाँव वालों ने की कहीं वही गलती हम भी तो नहीं कर रहे हैं? कहीं हम किसी गधे के दिखाए रास्ते पर चल कर अपनी life बर्वाद तो नहीं कर रहे हैं? क्या आज हम जो भी काम या पढाई कर रहे हैं वो हमारे अपने interest के मुताबिक है या बस समाज और घरवालों के दबाव में हम अपना रास्ता ढूँढने से हिचक रहे हैं? कहीं हमें भी अपना रास्ता खोजने की ज़रुरुँत तो नहीं?
अगर हमे एक meaningful life जीनी है तो हमें इन प्रश्नों का उत्तर देना होगा, वरना उस इंजीनियर की तरह एक दिन हमें भी कोई मिलेगा और बताएगा कि हमने अपनी पूरी ज़िन्दगी एक गधे का रास्ता पकड़े-पकड़े बर्वाद कर दी।
STORY-डाकू अंगुलिमाल और महात्मा बुद्ध
डाकू अंगुलिमाल और महात्मा बुद्ध
बहुत पुरानी बात है मगध राज्य में एक सोनापुर नाम का गाँव था। उस गाँव के लोग शाम होते ही अपने घरों में आ जाते थे। और सुबह होने से पहले कोई कोई भी घर के बाहर कदम भी नहीं रखता था।इसका कारण डाकू अंगुलीमाल था।
डाकू अंगुलीमाल मगध के जंगलों की गुफा में रहता था। वह लोगों को लूटता था और जान से भी मार देता था। लोगों को डराने के लिए वह जिसे भी मारता उसकी एक ऊँगली काट लेता और उन उँगलियों की माला बनाकर पहनता। इसलिए उसका नाम अंगुलिमाल पड़ा। गाँव के सभी लोग परेशान थे कैसे इस डाकू के आतंक से छुटकारा मिले।
एक दिन गौतम बुद्ध उस गाँव में आये। गाँव के लोग उनकी आवभगत करने लगे। गौतम बुद्ध ने देखा कि गाँव के लोगों में किसी बात को लेकर देहशत फैली है!
तब गौतम बुद्ध ने गाँव वालों से इसका कारण पूछा- ये सुनते ही गाँव वालों ने अंगुलिमाल के आतंक का पूरा किस्सा उन्हें सुनाया।
अगले ही दिन गौतम बुद्ध जंगल की तरफ निकल गये, गाँव वालों ने उन्हें बहुत रोका पर वो नहीं माने। बुद्ध को आते देख अंगुलिमाल हाथों में तलवार लेकर खड़ा हो गया, पर बुद्ध उसकी गुफा के सामने से निकल गए उन्होंने पलटकर भी नहीं देखा। अंगुलिमाल उनके पीछे दौड़ा, पर दिव्य प्रभाव के कारण वो बुद्ध को पकड़ नहीं पा रहा था।
थक हार कर उसने कहा- “रुको”
बुद्ध रुक गए और मुस्कुराकर बोले- मैं तो कबका रुक गया पर तुम कब ये हिंसा रोकोगे।
अंगुलिमाल ने कहा- सन्यासी तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता। सारा मगध मुझसे डरता है। तुम्हारे पास जो भी माल है निकाल दो वरना, जान से हाथ धो बैठोगे। मैं इस राज्य का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हूँ।
बुद्ध जरा भी नहीं घबराये और बोले- मैं ये कैसे मान लूँ कि तुम ही इस राज्य के सबसे शक्तिशाली इन्सान हो। तुम्हे ये साबित करके दिखाना होगा।
अंगुलिमाल बोला बताओ- “कैसे साबित करना होगा?”।
बुद्ध ने कहा- “तुम उस पेड़ से दस पत्तियां तोड़ कर लाओ”।
अंगुलिमाल ने कहा- बस इतनी सी बात, “मैं तो पूरा पेड़ उखाड़ सकता हूँ”।
अंगुलिमाल ने दस पत्तियां तोड़कर ला दीं।
बुद्ध ने कहा- अब इन पत्तियों को वापस पेड़ पर जाकर लगा दो।
अंगुलिमाल ने हैरान होकर कहा- टूटे हुए पत्ते कहीं वापस लगते हैं क्या ?
तो बुद्ध बोले – जब तुम इतनी छोटी सी चीज़ को वापस नहीं जोड़ सकते तो तुम सबसे शक्तिशाली कैसे हुए ?
यदि तुम किसी चीज़ को जोड़ नहीं सकते तो कम से कम उसे तोड़ो मत, यदि किसी को जीवन नहीं दे सकते तो उसे म्रत्यु देने का भी तुम्हे कोई अधिकार नहीं है।
ये सुनकर अंगुलीमाल को अपनी गलती का एहसास हो गया। और वह बुद्ध का शिष्य बन गया। और उसी गाँव में रहकर लोगों की सेवा करने लगा।
आगे चलकर यही अंगुलिमाल बहुत बड़ा सन्यासी बना और अहिंसका के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कोई भी इन्सान कितना ही बुरा क्यों न हो, वह बदल सकता है। दोस्तों, अंगुलिमाल बुराई का एक प्रतीक है, और हम सबमें छोटे-बड़े रूप में कोई न कोई बुराई है। ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने अन्दर की बुराइयों को पहचाने और उन्हें ख़त्म करें।
महान प्रेरणा स्रोत – स्वामी विवेकानंद
महान प्रेरणा स्रोत – स्वामी विवेकानंद
भारतीय संस्कृति को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने वाले महापुरुष स्वामी विवेकानंद जी का जन्म 12 जनवरी 1863 को सूर्योदय से 6 मिनट पूर्व 6 बजकर 33 मिनट 33 सेकेन्ड पर हुआ। भुवनेश्वरी देवी के विश्वविजयी पुत्र का स्वागत मंगल शंख बजाकर मंगल ध्वनी से किया गया। ऐसी महान विभूती के जन्म से भारत माता भी गौरवान्वित हुईं।
बालक की आकृति एवं रूप बहुत कुछ उनके सन्यासी पितामह दुर्गादास की तरह था। परिवार के लोगों ने बालक का नाम दुर्गादास रखने की इच्छा प्रकट की, किन्तु माता द्वारा देखे स्वपन के आधार पर बालक का नाम वीरेश्वर रखा गया।प्यार से लोग ‘बिले’ कह कर बुलाते थे। हिन्दू मान्यता के अनुसार संतान के दो नाम होते हैं, एक राशी का एवं दूसरा जन साधारण में प्रचलित नाम , तो अन्नप्रासन के शुभ अवसर पर बालक का नाम नरेन्द्र नाथ रखा गया।
नरेन्द्र की बुद्धी बचपन से ही तेज थी।बचपन में नरेन्द्र बहुत नटखट थे। भय, फटकार या धमकी का असर उन पर नहीं होता था। तो माता भुवनेश्वरी देवी ने अदभुत उपाय सोचा, नरेन्द्र का अशिष्ट आचरण जब बढ जाता तो, वो शिव शिव कह कर उनके ऊपर जल डाल देतीं। बालक नरेन्द्र एकदम शान्त हो जाते। इसमे संदेह नही की बालक नरेन्द्र शिव का ही रूप थे।
माँ के मुहँ से रामायण महाभाऱत के किस्से सुनना नरेन्द्र को बहुत अच्छा लगता था।बालयावस्था में नरेन्द्र नाथ को गाङी पर घूमना बहुत पसन्द था। जब कोई पूछता बङे हो कर क्या बनोगे तो मासूमियत से कहते कोचवान बनूँगा।
पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखने वाले पिता विश्वनाथ दत्त अपने पुत्र को अंग्रेजी शिक्षा देकर पाश्चातय सभ्यता में रंगना चाहते थे। किन्तु नियती ने तो कुछ खास प्रयोजन हेतु बालक को अवतरित किया था।
ये कहना अतिश्योक्ती न होगा कि भारतीय संस्कृती को विश्वस्तर पर पहचान दिलाने का श्रेय अगर किसी को जाता है तो वो हैं स्वामी विवेकानंद। व्यायाम, कुश्ती,क्रिकेट आदी में नरेन्द्र की विशेष रूची थी। कभी कभी मित्रों के साथ हास –परिहास में भी भाग लेते। जनरल असेम्बली कॉलेज के अध्यक्ष विलयम हेस्टी का कहना था कि नरेन्द्रनाथ दर्शन शास्त्र के अतिउत्तम छात्र हैं। जर्मनी और इग्लैण्ड के सारे विश्वविद्यालयों में नरेन्द्रनाथ जैसा मेधावी छात्र नहीं है।नरेन्द्र के चरित्र में जो भी महान है, वो उनकी सुशिक्षित एवं विचारशील माता की शिक्षा का ही परिणाम है।बचपन से ही परमात्मा को पाने की चाह थी।डेकार्ट का अंहवाद, डार्विन का विकासवाद, स्पेंसर के अद्वेतवाद को सुनकर नरेन्द्रनाथ सत्य को पाने का लिये व्याकुल हो गये। अपने इसी उद्देश्य की पूर्ती हेतु ब्रह्मसमाज में गये किन्तु वहाँ उनका चित्त शान्त न हुआ। रामकृष्ण परमहंस की तारीफ सुनकर नरेन्द्र उनसे तर्क के उद्देश्य से उनके पास गये किन्तु उनके विचारों से प्रभावित हो कर उन्हे गुरू मान लिया। परमहसं की कृपा से उन्हे आत्म साक्षात्कार हुआ। नरेन्द्र परमहंस के प्रिय शिष्यों में से सर्वोपरि थे। 25 वर्ष की उम्र में नरेन्द्र ने गेरुवावस्त्र धारण कर सन्यास ले लिया और विश्व भ्रमण को निकल पङे।
1893 में शिकागो विश्व धर्म परिषद में भारत के प्रतीनिधी बनकर गये किन्तु उस समय युरोप में भारतीयों को हीन दृष्टी से देखते थे। उगते सूरज को कौन रोक पाया है, वहाँ लोगों के विरोध के बावजूद एक प्रोफेसर के प्रयास से स्वामी जी को बोलने का अवसर मिला। स्वामी जी ने बहिनों एवं भाईयों कहकर श्रोताओं को संबोधित किया। स्वामी जी के मुख से ये शब्द सुनकर करतल ध्वनी से उनका स्वागत हुआ। श्रोता उनको मंत्र मुग्ध सुनते रहे निर्धारित समय कब बीत गया पता ही न चला। अध्यक्ष गिबन्स के अनुरोध पर स्वामी जी आगे बोलना शुरू किये तथा 20 मिनट से अधिक बोले। उनसे अभिभूत हो हज़ारों लोग उनके शिष्य बन गये। आलम ये था कि जब कभी सभा में शोर होता तो उन्हे स्वामी जी के भाषण सुनने का प्रलोभन दिया जाता सारी जनता शान्त हो जाती।
अपने व्यख्यान से स्वामी जी ने सिद्ध कर दिया कि हिन्दु धर्म भी श्रेष्ठ है, उसमें सभी धर्मों समाहित करने की क्षमता है।इस अदभुत सन्यासी ने सात समंदर पार भारतीय संसकृती की ध्वजा को फैराया।
स्वामी जी केवल संत ही नही देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक एवं मानव प्रेमी थे। 1899 में कोलकता में भीषण प्लेग फैला, अस्वस्थ होने के बावजूद स्वामी जी ने तन मन धन से महामारी से ग्रसित लोगों की सहायता करके इंसानियत की मिसाल दी। स्वामी विवेकानंद ने, 1 मई,1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। रामकृष्ण मिशन, दूसरों की सेवा और परोपकार को कर्मयोग मानता है जो कि हिन्दुत्व में प्रतिष्ठित एक महत्वपूर्ण सिध्दान्त है।
39 वर्ष के संक्षिप्त जीवन काल में स्वामी जी ने जो अदभुत कार्य किये हैं, वो आने वाली पिढीयों को मार्ग दर्शन करते रहेंगे। 4 जुलाई 1902 को स्वामी जी का अलौकिक शरीर परमात्मा मे विलीन हो गया।
स्वामी जी का आदर्श- “उठो जागो और तब तक न रुको जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाए” अनेक युवाओं के लिये प्रेरणा स्रोत है। स्वामी विवेकानंद जी का जन्मदिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।
मानव शरीर के बारे में महत्वपूर्ण तथ्यो..
महत्वपूर्ण तथ्य
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1. वस्यक व्यक्तियों में अस्थियों की संख्या : → 206
2. खोपड़ी में अस्थियां : → 28
3. कशेरुकाओ की संख्या : →33
4. पसलियों की संख्या : →24
5. गर्दन में कशेरुकाएं : →7
6. श्वसन गति : →16 बार प्रति मिनिट
7. हृदय गति : →72 बार प्रति मिनिट
8. दंत सूत्र : → 2:1:2:3
9. रक्तदाव : →120/80
10. शरीर का तापमान : → 37 डीग्री 98.4 फ़ारेनहाइट
11. लाल रक्त कणिकाओं की आयु : → 120 दिन
12. श्वेत रक्त कणिकाओ की आयु : →1 से 3 दिन
13. चेहरे की अस्थियां : → 14
14. जत्रुक की संख्या : →2
15. हथेली की अस्थियां : → 14
16 पंजे की अस्थियां : → 5
17. ह्दय की दो धड़कनों के बीच का समय : → 0.8 से.
18. एक श्वास में खीची गई वायु : →500 मि.मी.
19. सुनने की क्षमता : →20 से १२० डेसीबल
20. कुल दांत : →32
21. दूध के दांतों की संख्या : → 20
22. अक्ल दाढ निकलने की आयु : → 17 से 25 वर्ष
23. शरीर में अमीनों अम्ल की संख्या : → 22
24. शरीर में तत्वों की संखया : → 24
25. शरीर में रक्त की मात्रा : → 5 से 6 लीटर
(शरीर के भार का 7 प्रतिशत)
26. शरीर में पानी की मात्रा : → 70 प्रतिशत
27. रक्त का PH मान : → 7.4
28. ह्दय का भार : → 300 ग्राम
29. महिलाओं के ह्दय का भार → 250 ग्राम
30. रक्त संचारण में लगने वाला समय → 22 से.
31. छोटी आंत की लंबाई → 22 फीट
33. शरीर में पानी की मात्रा → 22 लीटर
34. मष्तिष्क का भार → 1380 ग्राम
35. महिलाओं के मष्तिष्क का भार → 1250 ग्राम
36. गुणसूत्रों की संख्या → 23 जोड़े
37. जीन्स की संख्या →97 अरब
जुनागढ राज का पुरा ईतिहास .
जुनागढ राज का पुरा ईतिहास .......
जुनागढ का नाम सुनते ही लोगो के दिमाग मे “आरझी हकुमत द्वारा जुनागढ का भारतसंघ मे विलय, कुतो के शोखीन नवाब, भुट्टो की पाकिस्तान तरफी नीति ” जैसे विचार ही आयेंगे, क्योकी हमारे देश मे ईतिहास के नाम पर मुस्लिमो और अंग्रेजो की गुलामी के बारे मे ही पढाया जाता है, कभी भी हमारे गौरवशाली पूर्खो के बारे मे कही भी नही पढाया जाता || जब की हमारा ईतिहास इससे कई ज्यादा गौरवशाली, सतत संघर्षपूर्ण और वीरता से भरा हुआ है ||
> जुनागढ का ईतिहास भी उतना ही रोमांच, रहस्यो और कथाओ से भरा पडा है || जुनागढ पहले से ही गुजरात के भुगोल और ईतिहास का केन्द्र रहा है, खास कर गुजरात के सोरठ प्रांत की राजधानी रहा है || गिरीनगर के नाम से प्रख्यात जुनागढ प्राचीनकाल से ही आनर्त प्रदेश का केन्द्र रहा है || उसी जुनागढ पर चंद्रवंश की एक शाखा ने राज किया था, जिसे सोरठ का सुवर्णकाल कहा गया है || वो राजवंश चुडासमा राजवंश | जिसकी अन्य शाखाए सरवैया और रायझादा है ||
> मौर्य सत्ता की निर्बलता के पश्चात मैत्रको ने वलभी को राजधानी बनाकर सोरठ और गुजरात पर राज किया || मैत्रको की सत्ता के अंत के बाद और 14 शताब्दी मे गोहिल, जाडेजा, जेठवा, झाला जैसे राजवंशो के सोरठ मे आने तक पुरे सोरठ पर चुडासमाओ का राज था ||
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> भगवान आदिनारायण से 119 वी पीढी मे गर्वगोड नामक यादव राजा हुए, ई.स.31 मे वे शोणितपुर मे राज करते थे || उनसे 22 वी पीढी मे राजा देवेन्द्र हुए, उनके 4 पुत्र हुए,
1) असपत, 2)नरपत, 3)गजपत और 4)भूपत
असपत शोणितपुर की गद्दी पर रहे, गजपत, नरपत और भूपत ने एस नये प्रदेश को जीतकर विक्रम संवत 708, बैशाख सुदी 3, शनिवार को रोहिणी नक्षत्र मे ‘गजनी’ शहर बसाया || नरपत ‘जाम’ की पदवी धारण कर वहा के राजा बने, जिनके वंशज आज के जाडेजा है || भूपत ने दक्षिण मे जाके सिंलिद्रपुर को जीतकर वहां भाटियानगर बसाया, बाद मे उनके वंशज जैसलमेर के स्थापक बने जो भाटी है ||
> गजपत के 15 पुत्र थे, उसके पुत्र शालवाहन, शालवाहन के यदुभाण, यदुभाण के जसकर्ण और जसकर्ण के पुत्र का नाम समा था || यही समा कुमार के पुत्र चुडाचंद्र हुए || वंथली (वामनस्थली) के राजा वालाराम चुडाचंद्र के नाना थे || वो अपुत्र थे ईसलिये वंथली की गद्दी पर चुडाचंद्र को बिठाया || यही से सोरठ पर चुडासमाओ का आगमन हुआ, वंथली के आसपास का प्रदेश जीतकर चुडाचंद्र ने उसे सोरठ नाम दिया, जंगल कटवाकर खेतीलायक जमीन बनवाई, ई.स. 875 मे वो वंथली की गद्दी पर आये || 32 वर्ष राज कर ई.स. 907 मे उनका देहांत हो गया ||
वंथली के पास धंधुसर की हानीवाव के शिलालेख मे लिखा है :
|| श्री चन्द्रचुड चुडाचंद्र चुडासमान मधुतदयत |
जयति नृप दंस वंशातस संसत्प्रशासन वंश ||
– अर्थात् जिस प्रकार चंद्रचुड(शंकर) के मस्तक पर चंद्र बिराजमान है, उसी प्रकार सभी उच्च कुल से राजा ओ के उपर चंद्रवंशी चुडाचंद्र सुशोभित है ||
## चुडासमा/रायझादा/सरवैया वंश की वंशावली ##
1. श्री आदी नारायण
3. अत्रि
5. सोम
11. ययाति
12. यदु
59. सुरसेन
60. वसुदेव
61. श्री कृष्ण
62. अनिरुद्ध
63. वज्रनाभ
140. देवेन्द्र
141. गजपत
142. शालिवाहन
143. यदुभाण
144. जसकर्ण
145. समाकुमार
••• 146. चुडचंद्र (ई.स. 875-907)
••• हमीर
>> चुडचंद्र का पुत्र ||
••• मुलराज (ई.स. 907-915)
>> चुडचंद्र के पश्चात उनका पोत्र मुलराज वंथली की गद्दी पर आया || मुलराज ने सिंध पर चडाई कर किसी समा कुल के राजा को हराया था ||
••• विश्ववराह (ई.स. 915-940)
>> विश्ववराह ने नलिसपुर राज्य जीतकर सौराष्ट्र का लगभग समस्त भुभाग जीत लिया था ||
••• रा’ ग्रहरिपु (ई.स. 940-982)
>> * विश्ववराह का पुत्र
* नाम – ग्रहार / ग्रहरिपु / ग्रहारसिंह / गारियो
* “रा’ / राह” पदवी धारन करने वाला प्रथम राजा (महाराणा/राओल/जाम जैसी पदवी जिसे ये राजा अपने नाम के पहले लगाते थे)
* कच्छ के राजा जाम लाखा फुलानी का मित्र
* मुलराज सोलंकी, रा’ग्रहरिपु और जाम लाखा फुलानी समकालिन थे
* आटकोट के युद्ध (ई.स. 979) मे मुलराज सोलंकी vs रा’ और जाम थे.
* जाम लाखा की मृत्यु उसी युद्ध मे हुई थी
* रा’ ग्रहरिपु की हार हुई और जुनागढ को पाटन का सार्वभौमत्व स्विकार करना पडा.
••• रा’ कवांट (ई.स. 982-1003)
>> ग्रहरिपु का बडा पुत्र, तलाजा के उगा वाला उसके मामा थे, जो जुनागढ के सेनापति बने. मुलराज सोलंकी को आटकोट युद्ध मे मदद करने वाले आबु के राजा को उगा वाला ने पकडकर जुनागढ ले आये….रा’ कवांट ने उसे माफी देकर छोड दिया… रा’ और मामा उगा के बीच कुछ मनभेद हुए इससे दोनो मे युद्ध हुआ और उगा वाला वीरगति को प्राप्त हुए ||
••• रा’ दियास (ई.स. 1003-1010)
>> अबतक पाटन और जुनागढ की दुश्मनी काफी गाढ हो चुकी थी | पाटन के दुर्लभसेन सोलंकी ने जुनागढ पर आक्रमन कीया | जुनागढ का उपरकोट तो आज भी अजेय है, इसलिये दुर्लभसेन ने रा’ दियास का मस्तक लानेवाले को ईनाम देने लालच दी | रा’ के दशोंदी चारन बीजल ने ये बीडा उठाया, रा’ ने अपना मस्तक काटकर दे दिया |
(ई.स. 1010-1025) – सोलंकी शासन
••• रा’ नवघण (ई.स. 1025-1044)
>> * रा’ दियास के पुत्र नवघण को एक दासी ने बोडीदर गांव के देवायत आहिर के घर पहुंचा दिया, सोलंकीओ ने जब देवायत को रा’ के पुत्र को सोंपने को कहा तो देवायत ने अपने पुत्र को दे दिया, बाद मे अपने साथीदारो को लेकर जुनागढ पर रा’ नवघण को बिठाया|
* गझनी ने ई.स 1026 मे सोमनाथ लुंटा तब नवघण 16 साल का था, उसकी सेना के सेनापति नागर ब्राह्मन श्रीधर और महींधर थे, सोमनाथ को बचाते हुए महीधर की मृत्यु हो गई थी |
* देवायत आहिर की पुत्री और रा’ नवघण की मुंहबोली बहन जाहल जब अपने पति के साथ सिंध मे गई तब वहां के सुमरा हमीर की कुदृष्टी उस पर पडी, नवघण को यह समाचार मिलते ही उसने पुरे सोरठ से वीरो को ईकठ्ठा कर सिंध पर हमला कर सुमरा को हराया, उसे जीवतदान दिया | (संवत 1087)
••• रा’ खेंगार (ई.स. 1044-1067)
>> रा’ नवघण का पुत्र, वंथली मे खेंगारवाव का निर्माण किया |
••• रा’ नवघण 2 (ई.स. 1067-1098)
>> * पाटन पर आक्रमन कर जीता, समाधान कर वापिस लौटा | अंतिम समय मे अपनी चार प्रतिज्ञाओ को पुरा करने वाले पुत्र को ही राजा बनाने को कहा | सबसे छोटे पुत्र खेंगार ने सब प्रतिज्ञा पुरी करने का वचन दिया इसलिये उसे गद्दी मिली |
* नवघण के पुत्र :
• सत्रसालजी – (चुडासमा शाखा)
• भीमजी – (सरवैया शाखा)
• देवघणजी – (बारैया चुडासमा शाखा)
• सवघणजी – (लाठीया चुडासमा शाखा)
• खेंगार – (जुनागढ की गद्दी)
••• रा’ खेंगार 2 (ई.स. 1098-1114)
>> * सिद्धराज जयसिंह सोलंकी का समकालिन और प्रबल शत्रु |
* उपरकोट मे नवघण कुवो और अडीकडी वाव का निर्माण कराया |
* सती राणकदेवी खेंगार की पत्नी थी |
* सिद्धराज जयसिंह ने जुनागढ पर आक्रमन कीया 12 वर्ष तक घेरा लगाया लेकिन उपरकोट को जीत ना पाया |
* सिद्धराज के भतीजे जो खेंगार के भांजे थ़े देशल और विशल वे खेंगार के पास ही रहते थे, सिद्धराज जयसिंह ने उनसे दगा करवाकर उपरकोट के दरवाजे खुलवाये |
* खेंगार की मृत्यु हो गई, सभी रानीयों ने जौहर किये, रानी रानकदेवी को सिद्धराज अपने साथ ले जाना चाहता था लेकिन वढवाण के पास रानकदेवी सति हुई, आज भी वहां उनका मंदीर है |
(ई.स. 1114-1125) – सोलंकी शासन
••• रा’ नवघण 3 (ई.स. 1125-1140)
>> अपने मामा जेठवा नागजी और मंत्री सोमराज की मदद से जुनागढ जीतकर पाटन को खंडणी भर राज किया |
••• रा’ कवांट 2 (ई.स. 1140-1152)
>> पाटन के कुमारपाल से युद्ध मे मृत्यु |
••• रा’ जयसिंह (ई.स. 1152-1180)
>> * संयुक्ता के स्वयंवर मे गये थे, जयचंद को पृथ्वीराज के साथ युद्ध मे सहायता की थी |
••• रा’ रायसिंहजी (ई.स. 1180-1184)
>> जयसिंह का पुत्र |
••• रा’ महीपाल (ई.स. 1184-1201)
>> ईनके समय घुमली के जेठवा के साथ युद्ध होते रहे |
••• रा’ जयमल्ल (ई.स. 1201-1230)
>> इनके समय भी जुनागढ और घुमली के बीच युद्ध होते रहे |
••• रा’ महीपाल 2 (ई.स. 1230-1253)
>> * ई.स.1250 मे सेजकजी गोहिल मारवाड से सौराष्ट्र आये, रा’ महिपाल के दरबार मे गये |
* रा’महीपाल का पुत्र खेंगार शिकार पर गया, उसका शिकार गोहिलो की छावनी मे गया, इस बात पर गोहिलो ने खेंगार को केद कर उनके आदमियो को मार दिया, रा’ ने क्षमा करके सेजकजी को जागीरे दी, सेजकजी की पुत्री का विवाह रा’ महीपाल के पुत्र खेंगार से किया |
••• रा’ खेंगार 3 (ई.स. 1253-1260)
>> अपने पिता की हत्या करने वाले एभल पटगीर को पकड कर क्षमादान दीया जमीन दी |
••• रा’ मांडलिक (ई.स. 1260-1306)
>> रेवताकुंड के शिलालेख मे ईसे मुस्लिमो पर विजय करनेवाला राजा लिखा है |
••• रा’ नवघण 4 (ई.स. 1306-1308)
>> राणजी गोहिल (सेजकजी गोहिल के पुत्र) रा’ नवघण के मामा थे, झफरखान के राणपुर पर आक्रमण करने के समय रा’ नवघण मामा की सहाय करने गये थे, राणजी गोहिल और रा’ नवघण उस युद्ध वीरोचित्त मृत्यु को प्राप्त हुए | ( ये राणपुर का वही युद्ध है जिसमे राणजी गोहिल ने मुस्लिमो की सेना को हराकर भगा दिया था, लेकिन वापिस लौटते समय राणजी के ध्वज को सैनिक ने नीचे रख दिया और वहा महल के उपर से रानीयो ने ध्वज को नीचे गीरता देख राणजी की मृत्यु समजकर कुवे मे गीरकर जौहर किया ये देख राणजी वापिस अकेले मुस्लिम सेना पर टुट पडे और वीरगति को प्राप्त हुए )
••• रा’ महीपाल 3 (ई.स. 1308-1325)
>> सोमनाथ मंदिर की पुनःस्थापना की |
••• रा’ खेंगार 4 (ई.स. 1325-1351)
>> सौराष्ट्र मे से मुस्लिम थाणो को खतम किया, दुसरे रजवाडो पर अपना आधिपत्य स्थापित किया |
••• रा’ जयसिंह 2 (ई.स. 1351-1373)
>> पाटन से झफरखान ने जुनागढ मे छावनी डाली, रा’ को मित्रता के लिये छावनी मे बुलाकर दगे से मारा, रा’जयसिंह ने तंबु मे बैठे झफरखां के 12 सेनापतिओ को मार दिया, उन सेनापतिओ कि कबरे आज जुनागढ मे बाराशहिद की कबरो के नाम से जानी जाती है |
••• रा’ महीपाल 4 (ई.स. 1373)
>> झफरखाँ के सुबे को हराकर वापिस जुनागढ जीता, सुलतान से संधि करी |
••• रा’ मुक्तसिंहजी (भाई) (ई.स. 1373-1397)
>> रा’ महिपाल का छोटा भाई , दुसरा नाम – रा’ मोकलसिंह |
••• रा’ मांडलिक 2 (ई.स. 1397-1400)
>> अपुत्र मृत्यु |
••• रा’ मेंलंगदेव (भाई) (ई.स. 1400-1415)
>> * मांडलिक का छोटा भाई |
* वि.सं. १४६९ ज्येष्ठ सुदी सातम को वंथली के पास जुनागढ और गुजरात की सेना का सामना हुआ, राजपुतो ने मुस्लिमो को काट दिया, सुलतान की हार हुई |
* ईसके बाद अहमदशाह ने खुद आक्रमन करा, राजपुतो ने केसरिया (शाका) किया, राजपुतानीओ ने जौहर किये, रा’ के पुत्र जयसिंह ने नजराना देकर सुलतान से संधि की |
••• रा’ जयसिंहजी 3 (ई.स.1415-1440)
>> गोपनाथ मंदिर को तोडने अहमदशाह की सेना जब झांझमेर आयी तब झांझमेर वाझा (राठौर) ठाकुरो ने उसका सामना किया, रा’जयसिंह ने भी अपनी सेना सहायार्थे भेजी थी, ईस लडाई मे भी राजपुत मुस्लिमो पर भारी पडे, सुलतान खुद सेना सहित भाग खडा हुआ |
••• रा’ महीपाल 5 (भाई) (ई.स.1440-1451)
>> पुत्र मांडलिक को राज सौंपकर संन्यास लेकर गिरनार मे साधना करने चले गये |
••• रा’ मांडलिक 3 (ई.स. 1451-1472)
>> * जुनागढ का अंतिम हिन्दु शासक |
* सोमनाथ का जिर्णोद्धार कराया |
* ई.स.1472 मे गुजरात के सुल्तान महमुद शाह (बेगडा) ने जुनागढ पर तीसरी बार आक्रमण किया, जुनागढ की सेना हारी, राजपुतो ने शाका और राजपुतानीयो ने जौहर किये, दरबारीओ के कहने पर रा’मांडलिक युद्ध से नीकलकर कुछ साथियो के साथ ईडर जाने को निकले ताकी कुछ सहाय प्राप्त कर सुल्तान से वापिस लड शके, सुल्तान को यह बात पता चली, उसने कुछ सेना मांडलिक के पीछे भेजी और सांतली नदी के मेदान मे मांडलिक की मुस्लिमो से लडते हुए मृत्यु हुई |
√√√√√ रा’मांडलिक की मृत्यु के पश्चात जुनागढ हंमेशा के लिये मुस्लिमो के हाथ मे गया, मांडलिक के पुत्र भुपतसिंह के व्यक्तित्व, बहादुरी व रीतभात से प्रभावित हो महमुद ने उनको बगसरा (घेड) की चौरासी गांवो की जागीर दी, जो आज पर्यंत उनके वंशजो के पास है |
* रा’मांडलिक के पुत्र भुपतसिंह और उनके वंशज ‘रायजादा’ कहलाये, रायजादा मतलब राह/रा’ का पुत्र |
••• रायजादा भुपतसिंह (ई.स. 1471-1505)
>> रायजादा भुपतसिंह के वंशज आज सौराष्ट्र प्रदेश मे रायजादा राजपुत कहलाते है,
* चुडासमा, सरवैया और रायजादा तीनो एक ही वंश की तीन अलग अलग शाख है | तीनो शाख के राजपुत खुद को भाई मानते है, अलग अलग समय मे जुदा पडने पर भी आज एक साथ रहते है |
> मध्यकालीन समय की दृष्टी से ईतिहास को देखे तो यह समय ‘राजपुत शासनकाल’ का सुवर्णयुग रहा | समग्र हिन्दुस्तान मे राजकर्ता ख्यातनाम राजपुत राजा ही थे | ईन राजपुत राजाओ मे सौराष्ट्र के प्रसिद्ध और समृद्ध राजकुल मतलब चुडासमा राजकुल, जिसने वंथली, जुनागढ पर करीब 600 साल राज किया, ईसिलिये मध्यकालिन गुजरात के ईतिहास मे चुडासमा राजपुतो का अमुल्य योगदान रहा है ||
° चुडासमा सरवैया रायजादा राजपूतो के गांव °
( रायजादा के गांव )
1. सोंदरडा 2. चांदीगढ 3. मोटी धंसारी
4. पीपली 5. पसवारिया 6. कुकसवाडा
7. रुपावटी 8. मजेवडी 9. चूडी- तणसा के पास
10. भुखी – धोराजी के पास 11. कोयलाणा (लाठीया)
( सरवैया के गांव )
सरवैया (केशवाला गांव भायात)
1. केशवाला 2. छत्रासा 3. देवचडी
4. साजडीयाली 5. साणथली 6. वेंकरी
7. सांढवाया 8. चितल 9. वावडी
सरवैया ( वाळाक के गांव)
1. हाथसणी 2. देदरडा 3. देपला
4. कंजरडा 5. राणपरडा 6. राणीगाम
7. कात्रोडी 8. झडकला 9. पा
10. जेसर 11. चिरोडा 12. सनाला
13. राजपरा 14. अयावेज 15. चोक
16. रोहीशाळा 17. सातपडा 18. कामरोल
19. सांगाणा 20. छापरी 21. रोजिया
22. दाठा 23. वालर 24. धाणा
25. वाटलिया 26. सांखडासर 27. पसवी
28. मलकिया 29. शेढावदर
सरवैया के और गांव जो अलग अलग जगह पर हे
1. नाना मांडवा 2. लोण कोटडा 3. रामोद
4. भोपलका 6. खांभा ( शिहोर के पास ) 7. विंगाबेर. 8. खेडोई
( चुडासमा के गांव )
जो चुडासमा को उपलेटा-पाटणवाव विस्तार की ओसम की चोराशी राज मे मीली वो लाठीया और बारिया चुडासमा के नाम से जाने गए
बारिया चुडासमा के गांव
1. बारिया 2. नवापरा 3. खाखीजालिया
4. गढाळा 5. केराळा 6. सवेंतरा
7. नानी वावडी 8. मोटी वावडी 9. झांझभेर
10. भायावदर 11. कोलकी
लाठिया चुडासमा के गांव
1. लाठ 2. भीमोरा 3. लिलाखा
4. मजीठी 5. तलगणा 6. कुंढेच
7. निलाखा
चुडासमा के गांव ( भाल विस्तार, धंधुका )
1. तगडी 2. परबडी 3. जसका
4. अणियारी 5. वागड 6. पीपळी
7. आंबली 8. भडियाद 9. धोलेरा
10. चेर 11. हेबतपुर 12. वाढेळा
13. बावलियारी 14. खरड 15. कोठडीया
16. गांफ 17. रोजका 18. उचडी
19. सांगासर 20. आकरू 21. कमियाळा
22. सांढिडा 23. बाहडी (बाड़ी) 24. गोरासु
25. पांची 26. देवगणा 27. सालासर
28. कादिपुर 29. जींजर 30. आंतरिया*
31. पोलारपुर 33. शाहपुर
33. खमीदाणा, जुनावडा मे अब कोइ परिवार नही रहेता
चुडासमा के अन्य गांव
1. लाठीया खखावी 2. कलाणा 3. चित्रावड
4. चरेल (मेवासिया चुडासमा) 5. बरडिया
• संदर्भ •
( गुजराती ग्रंथ)
* गुजराती मध्यकालीन राजपुत साहित्यनो ईतिहास – ले. दुर्गाशंकर शास्त्री
* सौराष्ट्रनो ईतिहास – ले. शंभुप्रसाद ह. देसाई
* यदुवंश प्रकाश – ले. मावदानजी रत्नु
* दर्शन अने ईतिहास – ले. डो.राजेन्द्रसिंह रायजादा
* चुडासमा राजवंशनी प्रशस्ति कविता – ले. डो.विक्रमसिंह रायजादा
* प्रभास अने सोमनाथ – ले. शंभुप्रसाद देसाई
* सोरठ दर्शन – सं. नवीनचंद्र शास्त्री
* सोमनाथ – ले. रत्नमणीराव भीमराव
* तारीख ए सोरठ – दीवान रणछोडजी
* चक्रवर्ती गुर्जरो – ले. कनैयालाल मुन्शी
(हिन्दी ग्रंथ)
* कहवाट विलास – सं. भाग्यसिंह शेखावत
* रघुवर जस प्रकाश – सीताराम कालस
* मांडलिक काव्य – गंगाधर शास्त्री
(सामयिको की सुची)
* पथिक (खास सौराष्ट्र अंक) (May/June 1971)
* उर्मी नवरचना (1971, 1988, 1989)
* राजपुत समाज दर्पण (August 1990)
* क्षत्रियबंधु (June 1992)
* चित्रलेखा (30/03/1992)
(हस्तप्रतो की सुची)
* सौराष्ट्र युनि., गुजराती भाषा – साहित्य भवन, राजकोट के हस्तप्रतभंडार से…
* बोटाद कवि विजयकरण महेडु के हस्तप्रतसंग्रह से…
* स्व श्री बाणीदानजी बारहठ (धुना) के हस्तप्रतभंडार से…